असम विधानसभा चुनावः मुस्लिम बहुल इलाक़े में क्या कह रहें हैं बीजेपी के मुसलमान उम्मीदवार

2011 की जनगणना के मुताबिक़ पूर्वोत्तर राज्य असम में मुसलमान वहाँ की आबादी के क़रीब 35 फ़ीसद हैं. अपनी बड़ी आबादी के लिहाज़ से वहाँ के चुनावों में मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग इनका है.

लेकिन राज्य में भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेता हिमंत बिस्व सरमा ने असम में चल रहे चुनावों से ठीक पहले यह कह दिया कि उनकी पार्टी को मुसलमानों के वोटों की ज़रूरत नहीं है. फिर टिकट बंटवारे के समय बीजेपी को लगा कि वो इस समुदाय की असम में पूरी तरह से अनदेखी नहीं कर सकती है तो पार्टी ने कुल सात मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा.

हालाँकि 2016 के विधानसभा चुनाव में यह संख्या नौ थी जिनमें केवल एक को ही जीत मिली सकी थी.

जिन प्रत्याशियों को बीजेपी ने असम के चुनावी समर में उतारा है, उनमें सबसे अधिक पाँच तीसरे और आख़िरी चरण में लोअर असम से मैदान में हैं.

असम की कुल 126 विधानसभा सीटों के लिए तीन चरणों में मतदान करवाए जा रहे हैं. 47 सीटों के लिए पहले चरण का मतदान 27 मार्च को हो चुका है, 39 सीटों पर दूसरे दौर का मतदान पहली अप्रैल को है जबकि तीसरे और अंतिम चरण के तहत 40 सीटों पर सात अप्रैल को वोट डाले जाएंगे.

कहाँ कहाँ से चुनावी मैदान में हैं बीजेपी के मुस्लिम प्रत्याशी?

लोअर असम मुस्लिम बहुल इलाक़ा है और वो भी बंगला भाषी मुसलमानों का.

जब बीजेपी ने यहाँ उम्मीदवारों की घोषणा की थी तो हिमंत बिस्व सरमा ने कहा था कि विधानसभा के चुनाव सांस्कृतिक आधार पर ही लड़े जाएंगे. उनका कहना था कि उन्हीं मुसलमान उम्मीदवारों को मैदान में उतारा गया है जो भारत और असम को अपनी मातृभूमि समझते हैं और वैष्णव पद्धति का सम्मान करते हैं.

यहाँ कि लाहरीघाट सीट से क़ादिरुज़्ज़मान जिन्नाह मैदान में हैं तो बाघबर से मुस्लिम महिला हसीन आरा ख़ातून को बीजेपी ने टिकट दिया है. वहीं रूपहीहाट से नाज़ीर हुसैन बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं तो शाहिदुल इस्लाम जनिया विधानसभा सीट से.

इनके अलावा सोनाई सीट से मौजूदा विधायक अमीनुल हक़ लस्कर फिर मैदान में हैं तो दक्षिण सालमारा से अशदुल इस्लाम उम्मीदवार बनाए गए हैं, बिलासीपाड़ा पश्चिम से डॉ. अबू बकर सिद्दीक़ और जलेश्वर सीट से उस्मान ग़नी को टिकट दिया गया है.

2016 में बीजेपी के मुस्लिम प्रत्याशियों का प्रदर्शन कैसा था?

वरिष्ठ पत्रकार शाहिद अली अहमद कहते हैं कि बीजेपी ने इस बार मुसलमान उम्मीदवारों को दी जाने वाली सीटें घटा दी हैं जबकि 2016 के विधानसभा चुनावों में पार्टी ने नौ मुसलमान उम्मीदवारों को टिकट दिया था.

अहमद के अनुसार भारतीय जनता पार्टी चाहती है कि वो मुस्लिम बहुल लोअर असम से भी सीटें जीते. इसलिए इस बार चुनावों में मुस्लिम उम्मीदवारों के लिए प्रचार की कमान संभालने के लिए बड़े नेताओं का भी आना जाना लगा हुआ है.

लोअर असम की इन सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं की अहम भूमिका होती हैं. दरअसल इन इलाक़ों को मौलाना बदरुद्दीन अजमल के नेतृत्व वाले ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट का गढ़ माना जाता है. हालाँकि इनमें से दक्षिण सालमारा और जनिया सीट पर काँग्रेस ने जीत दर्ज की थी. लेकिन इस बार काँग्रेस-एआइयूडीएफ़ गठबंधन के तहत साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं.

क्या कहते हैं बीजेपी के मुसलमान प्रत्याशी?

जानिया विधानसभा में हमारी मुलाक़ात प्रचार कर रहे इस सीट से बीजेपी के प्रत्याशी शाहिदुल इस्लाम से हुई. तब उनकी चुनावी सभा चल रही थी. सभा में ज़्यादातर महिलाओं की मौजूदगी ने लोगों को भी आश्चर्य में डाल दिया.

शाहिदुल इस्लाम ने बीबीसी से बात करने के दरम्यान यह स्वीकार किया कि लोअर असम में किसी मुसलमान का भारतीय जनता पार्टी की टिकट पर चुनाव लड़ना अपने आप में बहुत बड़ी चुनौती रही है. मगर वे कहते हैं कि इस बार उन्हें ऐसा नहीं लगता.

वे कहते हैं, “जो लोग मुझे ताने देते हैं वो विपक्षी दलों के समर्थक ही हैं. आम लोग मुझसे बात करते हैं. मेरी बात सुनते हैं. मैं उनके सामने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे के बारे में बताता हूँ. काफ़ी सारे काम हैं जो भारतीय जनता पार्टी की राज्य सरकार ने मुसलमानों के लिए किए हैं. लोग इस बात को स्वीकार भी करते हैं.”

हालाँकि सभा स्थल के ठीक पास गन्ने का रस बेचने वाले अनवर बातचीत के दौरान कहते हैं कि ‘सबका साथ, सबका विकास’ अगर सच्चा नारा है तो फिर हिमंत बिस्व सरमा जैसे नेता क्यों कहते हैं कि उन्हें मुसलामानों के वोट नहीं चाहिए.

यही सवाल मैंने बाघबर से बीजेपी की महिला प्रत्याशी हसीनआरा ख़ातून से पूछा तो उन्होंने कहा, “अब घर का गार्जियन कभी कुछ बोल देता है तो उसका बुरा नहीं मानना चाहिए. हिमंत बिस्व सरमा ने जो कहा है, लोग उसका मतलब समझ नहीं पाए हैं. मैं उन्हें समझा रही हूँ.”

हसीन आरा ख़ातून का कहना है कि असम में भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने मुसलमानों के लिए काफ़ी कुछ किया है जिसको विपक्ष के दल प्रचार नहीं करने देते हैं.

वे कहती हैं, “राज्य सरकार ने मस्जिदों के लिए धन उपलब्ध कराया है. केंद्र सरकार की योजनाओं का लाभ मुसलमान महिलाओं को भी ख़ूब मिला है. मुसलमान अब समझने लग गया है कि उसका फ़ायदा किसके साथ जाने में है. बदरुद्दीन अजमल चाचा तो अपने चुनावी फ़ायदे के लिए मुसलमानों को बांटने का काम ही करते रह गए.”

इस इलाक़े में प्रधानमंत्री की सभा का हवाला देते हुए हसीन आरा ख़ातून कहती हैं कि नरेंद्र मोदी ने खानापाड़ा की चुनावी सभा में गाँव में सड़क और शौचालयों के निर्माण पर ज़ोर दिया.

चूँकि हसीन आरा का चुनावी क्षेत्र बहुत पिछड़ा हुआ है, जहाँ पहुँचने के लिए सही सड़कें भी मौजूद नहीं हैं, वे कहती हैं कि इस इलाक़े के लोग धर्म की राजनीति बहुत झेल चुके हैं. वो चाहते हैं कि उनकी ज़िन्दगी भी बेहतर हो जाए. इसलिए वो भारतीय जनता पार्टी के वायदों पर भरोसा कर रहे हैं.

बीजेपी की तरफ़ से चुनाव लड़ने पर ताने भी सुनने पड़ते हैं”

भारतीय जनता पार्टी की चुनावी सभाएं मुस्लिम बहुल इलाक़ों में आकर्षण का केंद्र ज़रूर बन रहीं हैं. लोग बेहद चाव से नेताओं को सुनने भी आ रहे हैं. लेकिन वोट किसको जाएगा ये तो स्वाभाविक रूप से पता करना आसान नहीं है.

हसिन आरा बेगम के साथ प्रचार के दौरान शामिल नूर मोहम्मद कहते हैं, “लोग ताने ज़रूर देते हैं कि मुसलमान होते हुए भी भारतीय जनता पार्टी के लिए काम कर रहे हो. तो हम लोगों को बताते हैं कि जो योजनाएं बीजेपी ने शुरू की हैं उनका लाभ हम मुसलमानों को भी मिल रहा है.

बीजेपी की महिला मुसलमान समर्थक क्या कहती हैं?

कई मुसलमान महिलाएं भी बीजेपी के समर्थन में प्रचार करती नज़र आईं. परवीन माजिद भी इनमें से एक हैं जो प्रचार के काम में बढ़ चढ़ कर आगे आगे नज़र आ रही थीं.

प्रचार के दौरान बीबीसी से बात करते हुए वे कहती हैं कि काँग्रेस, वाम दल और बदरुद्दीन अजमल की पार्टी एआइयूडीएफ़ के समर्थक उनका काफ़ी विरोध करते हैं. मगर वे कहती हैं कि भारतीय जनता पार्टी में मुसलमान महिलाओं को सम्मान मिला है जिसकी वजह से वे उसमें शामिल हो गई हैं.

लोअर असम की ही रहने वाली जया बेगम कहती हैं, “जब वे बीजेपी के समर्थन में लोगों के बीच वोट माँगने जाती हैं तो लोगों में ये भरम आम तौर पर देखने को मिलता है कि कि बीजेपी सत्ता में आएगी तो मस्जिदों में नमाज़ बंद हो जाएगी, अज़ान बंद हो जाएगी.”

वे कहती हैं, “हम लोगों को बताते हैं कि केंद्र 2014 से बीजेपी की सरकार है और असम में पिछले पाँच सालों से. क्या कोई मस्जिद बंद की गई? या कहीं कोई अज़ान बंद करवाई गई?”

चुनावी सभा में मौजूद अन्जुमा ख़ातून कहती हैं कि राजनीतिक दलों ने लोअर असम में हमेशा से मुसलमानों को सिर्फ़ वोट हासिल करने के लिए इस्तेमाल किया है. उसके बदले में हमें क्या मिला? न सड़क है, न बिजली और न ही कोई संसाधन. यहाँ के लोग बड़ी तकलीफ़देह ज़िन्दगी गुज़ारने को मजबूर हैं. बीजेपी अगर काम कर रही है तो हमें अपना भविष्य देखना है, अपनी सुविधाएं देखनी है. यही यहाँ के मुसलमानों का बड़ा मुद्दा है.”

असम विधानसभा में मुस्लिम विधायकों का गणित

बीजेपी ने 2016 के चुनाव में कुल नौ मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे लेकिन केवल एक प्रत्याशी, सोनाई सीट से अमीनुल हक़ लस्कर, विधानसभा पहुँचे थे.

असम विधानसभा के चुनावी इतिहास को देखें तो किसी भी चुनाव में औसतन 28 से 32 मुस्लिम विधायक चुने जाते रहे हैं. 2005 से पहले काँग्रेस और असम गण परिषद के मुस्लिम उम्मीदवार जीतकर विधानसभा पहुँचते थे लेकिन बदरुद्दीन अजमल की पार्टी एआइयूडीएफ़ के 2006 के चुनाव में उतरने के बाद से मुस्लिम बहुल इलाक़ों में एआइयूडीएफ़ का ही सबसे अच्छा प्रदर्शन रहा है.

जानकार क्या कहते हैं?

असम की राजनीति को लंबे समय से कवर कर रहे वरिष्ठ पत्रकार बैकुंठ नाथ गोस्वामी कहते हैं, “काँग्रेस-एआइयूडीएफ़ के साथ आने से महागठबंधन को फ़ायदा होगा. पिछले चुनाव में काँग्रेस ने 26 सीटें जीती थी, उनमें 15 विधायक मुसलमान थे. पिछले चुनाव में एआइयूडीएफ़ की कम सीटें आई थीं. केवल 13 विधायक ही जीत सके थे. दोनों पार्टियों के कुल मुस्लिम विधायकों की संख्या 28 थी और एक मुसलमान विधायक बीजेपी से जीतकर आए थे.”

वे कहते हैं, “काँग्रेस-एआइयूडीएफ़ के अलग-अलग चुनाव लड़ने से उन्हें 12 सीटों पर नुक़सान उठाना पड़ा था और वहाँ बीजेपी बहुत कम अंतर से जीत गई थी. लेकिन मुस्लिम बहुल इलाक़े में काँग्रेस-एआइयूडीएफ़ से सीट छीनना किसी भी पार्टी के लिए आसान नहीं है. बीजेपी ने तो पहले चरण के मतदान से पहले ही हिंदू असमिया बहुल इलाक़ों में हिंदुत्व और मुग़लों का शासन आ जाएगा जैसी बातें कर मुसलमानों को और नाराज़ कर दिया है. इसके अलावा हिमंत बिस्व सरमा का ‘मियां मुसलमानों के वोट बीजेपी को नहीं चाहिए’ वाला बयान लोगों के ज़ेहन में है.”