क्या साधु संत ऐसे ही होते हैं?

एक बात आम जनता क्यों नही समझ पाती है कि एक साधु का जीवन पूरी सादगी के साथ गुज़रता है और एक अय्याश कभी भी साधु नही हो सकता. ना तो साधुओं के आलीशान घर होते हैं और ना ही वो भोग विलास में कोई इंटरेस्ट रखते हैं. लेकिन हाल ये है कि आजकल के बाबा और माताएँ इस तरह की हरकतें और पाप करते हुए नज़र आ रहे हैं कि कोई भी पढ़ा लिखा समझदार इंसान कभी भी किसी साधु या साध्वी पर भरोसा नही कर पायेगा.

राधे माँ की कहानी तो आप जानते है होंगे. अगर उनपर लगे आरोपों को सरल वाक्य में समझना हो तो बस यही कहा जा सकता है कि उनपर अपार कृपा नही बल्कि अश्लीलता फैलाने का आरोप है. राधे माँ उर्फ सुखविंदर एक छोटे से गांव दोरांगला से है. जब छोटी उम्र में शादी होने के बाद ग़रीबी झेली तो पति के विदेश जाने के बाद उसको भक्ति और भक्त बनाने में दिलचस्पी आने लगी. धीरे धीरे भक्तों की लाइनें लग गईं और लोग अंधे और बहरों की तरह उसके सत्संग में आने लगे. जो हरकतें वो करती आई है उसका ज़िक्र करने में भी शर्म आ रही है. राम रहीम उर्फ गुरमीत सिंह का सच तो दुनिया के सामने बाद में आया, लेकिन इसके ऊपर न सिर्फ आरोप लगे है बल्कि बिल्कुल साफ है कि सारे आरोप सच्चे हैं क्योंकि जिस तरह का चाल चलन इस राधे माँ ने अपनाया है उससे तो इसे औरत कहना भी थोड़ा अजीब लगता है.

अभी कल ही कि घटना है जब दिल्ली के एक पुलिस स्टेशन में ही बुलाकर एसएचओ ने राधे माँ की भक्ति शुरू कर दी. साथ साथ मे बाकी पुलिस वाले भी भक्ति में लीन हो गए. यही नही, सामने मिलकर खूब नाच गाना भी किया. ये वो साध्वी है जिसपर साध्वी ना होने के कई आरोप लगे हैं और सिर से लेकर पाँव तक सोने से भरा रहता है.

radhe maa aur police wala

जिस राधे माँ को गिरफ्तार करके हवालात में भर्ती करना चाहिए था उसी को थाने में लाकर पुलिस वालों ने भक्ति नाच शुरू कर दिया और पूरा वीआईपी ट्रीटमेंट दिया गया है. सबसे अहम बात ये है कि भक्ति चाहे किसी की भी हो, अंधभक्ति बिल्कुल भी सही नही है. चाहे वो भक्त सरकार के हों, या फिर किसी बाबा और साधु या साध्वी के. आंखें और दिमाग खोलकर ही किसी के अनुयायी बनें, यही फायदेमंद होगा, आपके लिए भी और पूरे समाज के लिए भी.

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