आज अगर इंदिरा गांधी होतीं पीएम तो पाकिस्तान को ऐसे देतीं जवाब

जम्मू-कश्मीर के उरी में आतंकी हमले के पश्चात् सरहद पर माहौल गर्म है. 18 जवानों की शहादत के बाद मोदी सरकार पाकिस्तान को जवाब देने की योजना बना रही है. केंद्र सरकार जो रणनीति बना रही है, वो सूत्रों के हवाले से मीडिया में आ रही है. इसके अनुसार मोदी सरकार कूटनीतिक मोर्चे पर पाकिस्तान को अलग-अलग करने के प्रयास में जुटी है. क्योंकि बीते ढाई साल में मोदी सरकार  ने पाकिस्तान के विरुद्ध कोई कड़ा एक्शन नहीं लिया जिसकी जमीन से आतंकवादी आए दिन हमारे सुरक्षाबलों पर हमला करते हैं तथा बड़े पैमाने पर नुकसान झेलना पड़ता है. किन्तु यदि आज इंदिरा गांधी जैसा प्रधानमंत्री होता तो हालात शायद अलग होते. इंदिरा कड़े मिजाज की थीं तथा उनके फैसले में आक्रामकता की झलक दिखती थी.

इंदिरा गांधी रणनीति बनाने में माहिर थीं तथा साहसी लीडर थीं.

वो सुरक्षाबलों के नेतृत्व पर हद से ज्यादा विश्वास करती थीं. उन्होंने हालात को देखते हुए  कार्रवाई करने के लिए सेना को खुली छूट दे रखी थी.

आर्म्ड फोर्सेज के लिए लक्ष्य तय होते थे.

सेना के तीनों अंगों के मध्य बेहतर समन्वय होता था.स्ट्रेटजिक, ऑपरेशनल व टैक्टिकल लेवल पर प्लानिंग होती थी.

स्ट्रेटजिक, ऑपरेशनल व टैक्टिकल लेवल पर प्लानिंग होती थी.

सेना के तीनों अंगों के मध्य बेहतर समन्वय होता था.

गंभीर संकट के चलते बिना अंतरराष्ट्रीय सहायता के राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने की सोच इंदिरा में जन्मजात थी.

साधारण दिनों में वो कोई निर्णय लेने में हिचकिचाती थीं किन्तु संकट का समय आते ही कहां और कब वार करना है, उन्हें बहुत ही अच्छे से पता होता था.

इंदिरा ने लिए थे ऐसे ही फैसले : बतौर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का सर्वप्रथम कार्यकाल 1966 से 1971 तक रहा. इसके चलते भारत व पाकिस्तान के मध्य 1971 की जंग पूरे विश्व  ने देखी.  ऐसे में यदि आज इंदिरा गांधी जैसा पीएम होता तो शायद पाकिस्तान से जंग प्रारम्भ हो गई होती. इतिहास इसका गवाह भी है. 30 जनवरी, 1971 को आतंकवादी इंडियन एयरलाइंस के एक विमान को हाइजैक कर लाहौर ले गए तथा इसे तहस-नहस कर दिया था. उस समय इंदिरा गांधी ने भारत से होकर आने-जाने वाली पाकिस्तान की सभी फ्लाइट्स तत्काल प्रभाव से सस्पेंड करने का आदेश दिया. इससे यह फायदा हुआ कि अक्टूबर-नवंबर में जब संकट चरम पर था तो पाकिस्तान अपनी सेनाएं पूर्वी बंगाल में जुटाने में नाकाम रहा.

लौटा दिया था आर्मी चीफ का इस्तीफा : अप्रैल 1971 में इंदिरा गांधी ने तत्तकालीन आर्मी चीफ सैम मानेकशॉ से पूछा कि क्या वो पाकिस्तान से जंग के लिए तैयार हैं? इस पर मानेकशॉ ने कुछ  परेशानियों का हवाला देते हुए जंग के लिए तैयारी से मना कर दिया. मानेकशॉ ने तो इस्तीफे तक की पेशकश कर दी थी किन्तु इंदिरा ने उनका इस्तीफा कबूल करने से इन्कार कर दिया. इसके पश्चात् मानेकशॉ ने कहा था कि वो जंग में जीत की गारंटी दे सकते हैं, यदि पीएम उन्हें अपनी शर्तों पर तैयारी की इजाजत देती हैं व एक तारीख तय की जाती है. इंदिरा ने उनकी शर्तें मान लीं थी. हकीकत में इंदिरा उस समय की परेशानियों से वाकिफ थीं किन्तु वो सेना के विचारों से अपनी कैबिनेट तथा पब्लिक ओपिनियन को वाकिफ कराना चाहती थीं.

PAK के परमाणु ठिकानों पर हमले का प्लान : इंदिरा गांधी ने 1980 में सत्ता में वापसी करने के पश्चात्  पाकिस्तान के परमाणु ठिकानों पर हमले का प्लान बनाया था. अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने लगभग साल भर पहले यह खुलासा किया था. इंदिरा गांधी पाकिस्तान को परमाणु हथियार क्षमता हासिल करने से रोकना चाहती थीं. यह घटना 1981 की है. इंदिरा गांधी की अगुआई वाली भारत सरकार पाकिस्‍तान के परमाणु हथि‍यार जुटाने के प्‍लान को लेकर फिक्रमंद थी. भारत सरकार का मानना था कि पाकिस्‍तान परमाणु हथि‍यार हासिल करने से बस कुछ ही कदम दूर है.

ऐसे में लगता है कि यदि आज इंदिरा गांधी देश की पीएम होतीं तो आतंकी हमले के 72 घंटे बीत जाने के पश्चात् भी सिर्फ बयानबाजी का दौर नहीं चलता रहता. और पाकिस्तान के मामले में कोई बड़ा निर्णय 24 घंटे के भीतर ही ले लिया गया होता. क्योंकि इंदिरा बोलने में कम, करके दिखाने में ज्यादा विश्वास करती थीं.