Elizabeth जंगल में सोईं थी राजकुमारी की तरह, जागीं तो महारानी बन गईं

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“दुनिया के इतिहास में पहली बार एक युवा लड़की राजकुमारी के तौर पर पेड़ पर चढ़ी, जैसा कि वो कहती हैं, ये उनका सबसे रोमांचक अनुभव रहा, लेकिन वो अगले दिन वो पेड़ से महारानी बन कर उतरीं.”- जिम कॉर्बेट

ब्रिटेन की महारानी एलीज़ाबेथ के राजकुमारी से महारानी बनने का किस्सा बेहद अनोखा है. जब उनके पिता की मौत हुई और वो महारानी बनीं तब राजकुमारी के तौर पर एलीज़ाबेथ केन्या के जंगलों में अपने जीवन के सबसे बेहतरीन एडवेंचर से भरे दिन बिता रहीं थीं. वो उस समय जंगली जानवरों को पेड़ों के ऊपर से देख रहीं थीं.  6 फरवरी, 1952 को दुनिया किंग जॉर्ज VI की मौत की खबर के साथ जगी. वो रात को नॉरफोक के अपने सैन्ड्रिंगम  शाही आवास में फेफड़ों के कैंसर का शिकार हो गए थे. 
 
उनकी 25 साल की बेटी और उनकी उत्तराधिकारी को उस दिन देर से यह ख़बर मिल पाई. वो अपने घर से हजारों किलोमीटर दूर केन्या के एबरडेयर्स (Aberdares) के जंगलों में थीं.  केन्या उस समय एक ब्रिटिश उपनिवेश था. यह एलिज़ाबेथ की कॉमनवेल्थ देशों की उस यात्रा का पहला पड़ाव था जिसपर वो अपने बीमार पिता के साथ नहीं अपने पति प्रिंस फिलिप के साथ कर रहीं थीं.

शाही जोड़े ने अपने आधिकारिक कामों से एक रात चुरा कर एबरडेयर्स के घने जंगलों के बीच में पेड़ पर बनी अपनी तरह की अनूठी लॉज में ठहरने का फैसला किया था.  

उस पेड़ के ऊपर बने होटल में बिताई उस रात के दौरान ब्रिटेन के राजा और उनके पिता की मौत हो गई और एलिज़ाबेथ महारानी बन गईं. 

पेड़ के ऊपर, नेचुरलिस्ट और शिकारी जिम कॉर्बेट शाही जोड़े के साथ थे. उन्होंने विजिटर्स बुक में लिखा, दुनिया के इतिहास में पहली बार एक युवा लड़की राजकुमारी के तौर पर पेड़ पर चढ़ी, जैसा कि वो कहती हैं, ये उनका सबसे रोमांचक अनुभव रहा, लेकिन वो अगले दिन वो पेड़ से महारानी बन कर उतरीं.  
 
असल में, एलिज़ाबेथ के पेड़ पर बनी लॉज से उतरने के बाद एडिनबर्ग के ड्यूक ने उन्हें यह खबर दी थी. लेकिन यही कहानी बनी रही और वो होटल स्थानीय तौर पर एक ऐसे होटल के नाम से प्रसिद्ध हो गया, जहां एक राजकुमारी रानी बनी. 
 
इसे 1932 में एक बड़े अंजीर के पेड़ पर अमीर सैलानियों के लिए रात्रिविश्राम स्थल की तरह बनाया गया था. यह शायद दुनिया में अपनी तरह का इकलौता था.  अफ्रीका के घने जंगलों में पेड़ शाखाओं के बीच बना एक निजी स्थान जहां से बड़े घरानों के लोग सुरक्षित रहते हुए नीचे पानी पीने आए जंगली जानवरों को पास से देख सकते थे.

एलिज़ाबेथ और फिलिप ने एक कागज पर अपने हाथ से लिखा था कि उन्होंने वहां क्या देखा, इसे आज तक इस लॉज में फ्रेम करके रखा गया है. इस पर इनके हस्ताक्षर भी हैं. 

इसमें लिखा है, – हाथियों का बड़ा झुंड—करीब 40 रहे होंगे.—साथ ही बबून बंदर और दलदली इलाकों में रहने वाले मृग 
5/6 फरवरी 1952 की रात को वो लिखते हैं, पूरा रात गेंडे दिखाई दिए और सुबह दो बैलों की लड़ाई देखी.  
 

शाही जोड़े ने अपने एक सहायक को होटल मालिक को धन्यवाद कहते हुए खत लिखने को कहा. इसमें उन्होंने इसे,  “प्रकृति की गोद में जंगली जानवरों की अठखेलियों को देखने का शानदार अनुभव बताया और कहा कि यहां दिन और रात “दिलचस्पी से भरे रहे.”

8 फरवरी 1952 को लिखा यह खत भी इस होटल की दीवार पर चस्पा है. इसमें लिखा है, – मुझे पूरा विश्वास है कि यह महारानी और एडिनबर्ग के ड्यूक के जीवन के सबसे बेहतरीन अनुभवों में से एक था. 
 
इस एतिहासिक यात्रा के दो साल के बाद, इस पेड़ पर बनी इस लॉज को जला दिया गया. ऐसी अफवाह उड़ी कि उपनिवेश के विरोधी माउ-माउ विद्रोहियों ने इसे जला दिया था. 
 
इसके बाद उस जानवरों के पानी पीने की जहग और मूल लॉज से दूसरी तरफ एक नया और पहले से भी बड़ा होटल 11  लकड़ी के खम्बों पर बनाया गया जो आज भी खड़ा है.  

शाही जोड़े की यात्रा के बाद यह दुनिया के प्रसिद्ध ट्रीटॉप होटलों में से एक है. अमीर मेहमान यहां प्रिंसेस एलिज़ाबेथ सुइट में रह सकते हैं और 1960 के दशक में शिकारियों द्वारा खीचीं गई फोटो देख सकते हैं जो हाथी दांत में मंढ़वाई गई है.  

1983 में एलिज़ाबेथ और फिलिप यहां वापस आए थे. यह एक सफारी से अधिक औपचारिक विजिट थी. उन्होंने देखा कि दोनों यात्राओं के 31 बरस के फासले में ट्रीटॉप कितना बदल गया है. लेकिन आज कोरोनावायरस के कारण यह ट्रीटॉप होटल बंद है.