बंगाल और तमिलानाडु में हुआ महिला सशक्तिकरण, मजबूत होकर उभरी है दीदी-अम्मा

सुबह जैसे ही ईवीएम से पांच राज्यों के चुनावी नतीजे निकलने शुरू हुए है पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु से सत्तारूढ़ दलों के लिए Unexpected खबरे सामने आने लगी। है Unexpected इसलिए कहा कि जिस एक तरफा बहुमत के साथ इन  दोनों महिलाओं ने अपने अपने राज्यों में जीत Enter की उसकी की उम्मीद तो शायद खुद उन्हें भी नहीं थी

चुनाव पूर्व तमाम सर्वेक्षणों में जहां पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सीट घटने की बाते हो रही थी वही  तमिलनाडु में तो जयललिता उर्फ़ अम्मा की वापसी का दावा तो कोई भी नहीं कर पा रहा था | कुल मिलकर दोनों ही नेताओं ने लोकसभा चुनावों की  सफलता को अपने अपने राज्यों में दोहराया है।

बीते चुनावों के मुकाबले में तो इस बार ममता बनर्जी के लिए पश्चिम बंगाल में परिस्थितियां इतनी

आसन तो बिकुल नहीं लग रही थी लेकिन शायद दीदी को भी आसान राजनीति रास नहीं आती है |

मुश्किलों से पार निकल जाना ही  उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खूबी है।

शारदा स्कैम जैसे बड़े घोटाले का दाग लगने  की वजह से और इसमें कई मंत्रियों के जेल जाने के बाद तो ममता बनर्जी की राजनीतिक राह मुश्किल जरूर हुई लेकिन वह कमजोर नहीं पड़ी | चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में उनकी सीटें घटने की बाते करी जाने लगी | लेकिन ममता जी इसे विरोधियों का शिगुफा बताकर ख़ारिज कर देती थी |

अपनी चुनावी रैलियों में वह विरोधियों  को भी सीधे मुकाबला कर ने की चुनौतिया देती रहती थी और अपने नेताओं और कार्यकर्ता को भी गलती पर फटकर लगाने से कभी नहीं चुकती |  पार्टी के साथ –साथ ही राज्य पर  भी ममता का पूर्व नियंत्रण रहा है | ये बंगाल में दीदी के बढ़ते हुए कद का ही प्रभाव था की मुख्य विपक्षी लेफ्ट को भी उनसे टक्कर लेने के कांग्रेस से गठजोड़ कर ने के लिए मजबूर होना ही पड़ा|

जब की ममता बनर्जी एकला चलो की निति पर ही बनी रही और इसे भी अपने लिए एक चोनौती ही मान लिया | ममता का माँ  माटी  और मानुष का नारा सीधे आम बंगाली के दिलो में उतरता ही चला गया और पिछली बार की 184  सीटों के मुकाबले में 210 से ज्यादा सीटों पर जित हासिल की है |